Day 21: कर्मयोग श्रेष्ठ (5.2) | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series


 

आज के 5 श्लोक:

  1. तत्त्ववित सांख्ययोगी भी देखते-सुनते-स्पर्श करते हुए “मैं कुछ नहीं करता” ऐसा मानता है (5.8)

  2. बिना श्रद्धा का कोई कर्म, दान या तप असत्—न यहाँ फल, न परलोक में (17.28)

  3. मुझ पुरुषोत्तम को तत्त्व से जानने वाला सब भाव से भक्ति करता है (15.19)

  4. कर्मयोग संन्यास से श्रेष्ठ—दोनों कल्याणकारी, पर कर्मयोग साधन में सुगम (5.2)

  5. काम धूम, मैल, जेर की तरह ज्ञान को ढक लेता है (3.38)

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और “आज मैं किस काम में ‘श्रद्धा + कर्मयोग’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?”

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