Day 56: समत्व, धीरता और सृष्टि का रहस्य | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक: “मैंने ये अद्भुत, रोमहर्षक संवाद सुना” —संजय का अनुभव (18.74) योगस्थः कुरु कर्माणि —सिद्धि–असिद्धि में समत्व ही योग है (2.48) समदुःखसुख धीर पुरुष —जो व्यथित नहीं होता, वही अमृतत्व के योग्य (2.15) तामस सुख —निद्रा, आलस्य, प्रमाद से उत्पन्न सुख, जो आगे–पीछे आत्मा को मोहित करे (18.39) “मेरी महत्-ब्रह्मरूप प्रकृति योनि है, मैं उसमें चेतन-गर्भ स्थापित करता हूँ” —जड़–चेतन संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति (14.3) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (18.74/2.48/2.15/18.39/14.3)" और "आज मैं किस जगह ‘समत्व + धीरता + तामस सुख से सावधानी + सृष्टि की ईश्वर-केन्द्रित दृष्टि’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"