Day 85 Script | संशय का नाश, सन्न्यास-योगी एकता, और विश्वरूप का अनादि तेज
आज के श्लोक गीता के मूल प्रश्नों का उत्तर देते हैं—संशयात्मा क्यों विनष्ट होता है, सच्चा संन्यासी-योगी कौन है, भगवान कौन-कौन से रूपों में प्रकट होते हैं, और विश्वरूप का अनादि-अनंत तेज कैसा है। यह episode साधना के व्यावहारिक पक्ष को स्पष्ट करता है। Description Day 85 में श्रीकृष्ण अर्जुन के विषाद पर हँसते हुए बोलते हैं (2.10), संशयात्मा के लिए न यह लोक न परलोक न सुख (4.40), निष्काम कर्म करने वाला ही सच्चा संन्यासी-योगी (6.1), भगवान वृष्णियों में वासुदेव और पांडवों में धनंजय (10.37), और विश्वरूप का अनादि-अनंत-चन्द्र-सूर्य नेत्र स्वरूप (11.19)। वीडियो शुरू करने से पहले: Channel को Subscribe कर लीजिए। Video को Like कर दीजिए। इसे Share कीजिए किसी गीता प्रेमी के साथ। Comment में लिखिए: "मेरा श्लोक = [number]" और "मेरा review = [word]" Tags #Day85 #BhagavadGita #GitaShlok #गीता #संशयविनाश #सन्न्यासयोगी #विश्वरूप #हरहरगीता #हरघरगीता #GitaInHindi #DailyShlok