Day 45: क्षेत्रज्ञ, महाकाल और स्वधर्म | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
अक्षरों में अकार, काल में अक्षय काल—भगवान अपनी विभूतियाँ बताते हैं (10.33)
यह शरीर क्षेत्र है—और जो इसे जानता है, वही क्षेत्रज्ञ है (13.1)
जो मुझे अजन्मा, अनादि, लोकमहेश्वर जानता है—वह मनुष्यों में असम्मूढ़ होकर पापों से मुक्त होता है (10.3)
स्वधर्म देखकर विचलित मत हो—क्षत्रिय के लिए धर्मयुक्त युद्ध से बढ़कर कुछ नहीं (2.31)
अर्जुन की देह-प्रतिक्रिया—अंग शिथिल, मुख सूखा, शरीर काँपा, रोमांच हुआ (1.29)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (10.33/13.1/10.3/2.31/1.29)"
और "आज मैं किस जगह ‘मैं शरीर नहीं, क्षेत्रज्ञ हूँ’ या ‘स्वधर्म से नहीं डगमगाऊँगा’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
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