Posts

Showing posts from March, 2026

Day 60: पुरुषोत्तम, समदर्शी योगी और आत्मसंयम | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series

Image
  आज के 5 श्लोक: मैं ही सूर्य, वर्षा, अमृत, मृत्यु और सत्-असत् हूँ  (9.19) जो सर्वज्ञ, अनादि, नियन्ता, सूक्ष्म, धारण-पोषणकर्ता और अचिन्त्यरूप का स्मरण करे  (8.9) ज्ञान–विज्ञान से तृप्त, कूटस्थ, विजितेन्द्रिय, समलोष्टाश्मकाञ्चन योगी  (8.9) इन्द्रियकर्म और प्राणकर्म को आत्मसंयम-योगाग्नि में हवन करना  (4.27) क्षर से अतीत, अक्षर से भी उत्तम—पुरुषोत्तम  (15.18) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (9.19/8.9/4.27/15.18)" और "आज मैं किस जगह ‘पुरुषोत्तम-बोध + समदर्शिता + आत्मसंयम’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"

Day 59: कर्म से अनासक्ति, सबके लिए परमगति | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series

Image
  आज के 5 श्लोक: कर्म मुझको नहीं बाँधते —क्योंकि मैं उनमें उदासीनवत् स्थित हूँ (9.9) अर्जुन ने विराट में सबको प्रवेश करते देखा —धृतराष्ट्र-पुत्र, भीष्म, द्रोण, कर्ण, सब (11.26) मेरे भक्त के लक्षण —अनपेक्ष, शुचि, दक्ष, उदासीन, गतव्यथ, सर्वारम्भपरित्यागी (12.16) भगवान को वेद, तप, दान, यज्ञ से नहीं देखा जा सकता —जैसा अर्जुन ने देखा, वैसा विशेष कृपा से (11.53) स्त्री, वैश्य, शूद्र, पापयोनि भी शरण लेकर परमगति पाते हैं  (9.32) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (9.9/11.26/12.16/11.53/9.32)" और "आज मैं किस जगह ‘अनासक्ति + भक्ति का शुद्ध भाव + सबके लिए आशा’ को जीऊँगा/जीऊँगी?"

Day 58: युद्ध-सज्जा, ध्यान, और प्रकृति-पुरुष | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series

Image
  आज के 5 श्लोक: कौरव-पक्ष के वीरों की गिनती —काशिराज, शिखण्डी, धृष्टद्युम्न, विराट, सात्यकि (1.17) शनैः शनैः मन को परमात्मा में स्थिर करो —और और कुछ न सोचो (6.25) सम्पूर्ण भूत इन दोनों प्रकृतियों से उत्पन्न —और भगवान जगत का प्रभव–प्रलय हैं (7.6) समबुद्धि वाले मनीषी फल त्यागकर अनामय पद को जाते हैं  (2.51) इन्द्रियों को वश में कर मत्पर होकर ध्यान में बैठो —तभी प्रज्ञा स्थिर होती है (2.61) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (1.17/6.25/7.6/2.51/2.61)" और "आज मैं किस जगह ‘धैर्यपूर्ण अभ्यास + इन्द्रिय-संयम + फलत्याग’ को जीऊँगा/जीऊँगी?"

Day 57: अनन्य भक्ति, ज्ञान–विज्ञान और मत्संस्थ शान्ति | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series

Image
  आज के 5 श्लोक: सैकड़ों–हजारों दिव्य रूप —अर्जुन को भगवान का अद्भुत विराट-प्रसार दिखता है (11.5) अनन्य भक्ति से ही मुझे तत्त्वतः जाना/देखा/प्राप्त किया जा सकता है  (11.54) यह परम गोपनीय ज्ञान–विज्ञान —जिससे अशुभ संसार से मुक्ति मिलती है (9.1) नियतमनस योगी —मुझमें आत्मा को लगाकर मत्संस्थ निर्वाणपरमा शान्ति पाता है (6.15) श्रवणपरायण मन्दबुद्धि भी संसार-सागर तर जाते हैं  (13.25) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (11.5/11.54/9.1/6.15/13.25)" और "आज मैं किस जगह ‘अनन्य भक्ति + ज्ञान–विज्ञान + मत्संस्थ शान्ति’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"

Day 56: समत्व, धीरता और सृष्टि का रहस्य | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series

Image
  आज के 5 श्लोक: “मैंने ये अद्भुत, रोमहर्षक संवाद सुना” —संजय का अनुभव (18.74) योगस्थः कुरु कर्माणि —सिद्धि–असिद्धि में समत्व ही योग है (2.48) समदुःखसुख धीर पुरुष —जो व्यथित नहीं होता, वही अमृतत्व के योग्य (2.15) तामस सुख —निद्रा, आलस्य, प्रमाद से उत्पन्न सुख, जो आगे–पीछे आत्मा को मोहित करे (18.39) “मेरी महत्-ब्रह्मरूप प्रकृति योनि है, मैं उसमें चेतन-गर्भ स्थापित करता हूँ” —जड़–चेतन संयोग से सब भूतों की उत्पत्ति (14.3) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (18.74/2.48/2.15/18.39/14.3)" और "आज मैं किस जगह ‘समत्व + धीरता + तामस सुख से सावधानी + सृष्टि की ईश्वर-केन्द्रित दृष्टि’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"

Day 55: यज्ञ, अधियज्ञ, नरक-द्वार और अनन्य भक्ति | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series

Image
आज के 5 श्लोक: यज्ञभाव से मिले भोग, लौटाए बिना अकेले भोगना = चोरी  (3.12) “अधियज्ञ कौन? शरीर में कैसे? और अन्त समय में कैसे जाना जाए?” —अर्जुन का गहरा प्रश्न (8.2) विश्व रूप के बाद पुनः चार भुजा और सौम्य मूर्ति दिखाकर अर्जुन को धीरज देना  (11.50) क्रोध, लोभ, काम – तीन नरक–द्वारों से मुक्त होकर ही परा गति  (16.22, भाव) “यदि सुदुराचार भी हो, पर अनन्य भाव से भजता हो, तो साधु मानो”  (9.30) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (3.12/8.2/11.50/16.22/9.30)" और "आज मैं किस जगह ‘यज्ञभाव + नरक-द्वार से सावधानी + अनन्य भक्ति की हिम्मत’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"