Day 60: पुरुषोत्तम, समदर्शी योगी और आत्मसंयम | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
मैं ही सूर्य, वर्षा, अमृत, मृत्यु और सत्-असत् हूँ (9.19)
जो सर्वज्ञ, अनादि, नियन्ता, सूक्ष्म, धारण-पोषणकर्ता और अचिन्त्यरूप का स्मरण करे (8.9)
ज्ञान–विज्ञान से तृप्त, कूटस्थ, विजितेन्द्रिय, समलोष्टाश्मकाञ्चन योगी (8.9)
इन्द्रियकर्म और प्राणकर्म को आत्मसंयम-योगाग्नि में हवन करना (4.27)
क्षर से अतीत, अक्षर से भी उत्तम—पुरुषोत्तम (15.18)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (9.19/8.9/4.27/15.18)"
और "आज मैं किस जगह ‘पुरुषोत्तम-बोध + समदर्शिता + आत्मसंयम’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
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