Day 71: दिव्य दृष्टि, देहान्तरण और योगारूढ़ शांति | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के Day 71 में 5 अत्यंत महत्वपूर्ण श्लोक हैं—दिव्य चक्षु के बिना भगवान के ऐश्वर्य-दर्शन की असंभवता, पुराने वस्त्रों की तरह देह-परिवर्तन, नैष्कर्म्यसिद्धि की सर्वोच्च स्थिति, योगारूढ़ होने का मार्ग, और भगवान का सृष्टि, विद्या तथा वाद में सर्वव्यापक स्वरूप। 11.8 बताता है कि सामान्य प्राकृत नेत्रों से भगवान के योगैश्वर्य का दर्शन संभव नहीं, इसलिए दिव्य दृष्टि आवश्यक है।
यह episode उन साधकों के लिए है जो form से beyond जाकर vision, detachment और inner steadiness को समझना चाहते हैं। 2.22 देहान्तरण को पुराने वस्त्र बदलने की उपमा से समझाता है; 18.49 बताता है कि सर्वत्र आसक्ति रहित, स्पृहारहित और जितेन्द्रिय पुरुष नैष्कर्म्यसिद्धि प्राप्त करता है; 6.3 कर्म और शम को योग-मार्ग के दो चरणों की तरह रखता है; और 10.32 भगवान को सृष्टियों का आदि, अन्त, मध्य, अध्यात्मविद्या और तत्त्वनिर्णय का वाद बताता है।
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"मेरा श्लोक = 11.8 / 2.22 / 18.49 / 6.3 / 10.32"
"आज मैंने किस जगह दिव्य दृष्टि, वैराग्य या योग-शांति का अभ्यास किया?"
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