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Showing posts from July, 2026

Day 140 | 5 Shlok Per Day | कुलधर्म का क्षय, नित्य संन्यास, सर्वत्र परमेश्वर, गुणातीत अनुभव

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आज के 5 श्लोक कुलधर्म के नष्ट होने के भय, द्वेष-इच्छा से रहित नित्यसंन्यास, सभी प्राणियों में समभाव से स्थित परमेश्वर के दर्शन, गुणों से परे भगवान की प्राप्ति, और “सत्” शब्द के पवित्र प्रयोग को एक साथ रखते हैं। 1.44 और 5.3 साधक को अधःपतन और वैराग्य के बीच संतुलन दिखाते हैं, जबकि 13.27, 14.19 और 17.26 अंतर्दृष्टि, परमसत्ता और शुद्ध शब्द के महत्व को उजागर करते हैं. Description Day 140 में हर हर गीता, हर घर गीता mission के साथ सुनिए: कुलधर्म नष्ट होने पर अनिश्चित नरक-वास का भय (1.44), न द्वेष न काङ्क्षा रखने वाले कर्मयोगी का नित्यसंन्यासी होना (5.3), नष्ट होते हुए सब प्राणियों में सम भाव से स्थित परमेश्वर का दर्शन करना (13.27), तीनों गुणों से परे कर्ता-भाव को न देखकर भगवान के स्वरूप को प्राप्त होना (14.19), और सत्यभाव, साधुभाव तथा उत्तम कर्म में “सत्” शब्द का उपयोग (17.26)। यह episode Jagat Ka Saar को dharma protection, inner renunciation, universal vision, and sacred speech के साथ जोड़ता है. वीडियो शुरू करने से पहले: Channel को Subscribe कर लीजिए. Video को Like कर दीजिए. इसे Share क...

Day 139 | 5 Shlok Per Day | राजस सुख, तामसी बुद्धि, यज्ञशेष अन्न, गुणातीत स्थिति और कर्मफल

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आज के 5 श्लोक बताते हैं कि विषय-संयोग का सुख पहले अमृत जैसा लगकर अंत में विष बन जाता है, तमोगुण बुद्धि को अधर्म को भी धर्म मानने तक भ्रमित कर देता है, यज्ञशेष अन्न खाने वाले पापों से मुक्त होते हैं, मान-अपमान में सम रहने वाला गुणातीत कहलाता है, और कर्मों के फल सात्त्विक, राजस तथा तामस रूप में अलग-अलग होते हैं। 18.38 और 18.32 भोग-बुद्धि की सीमाएँ दिखाते हैं, जबकि 3.13, 14.25 और 14.16 कर्म, समत्व और फल-नियम को स्पष्ट करते हैं. Description Day 139 में हर हर गीता, हर घर गीता mission के साथ सुनिए: विषय और इन्द्रियों के संयोग से मिलने वाले राजस सुख का अंततः विष बनना (18.38), तमोगुण से ढकी बुद्धि का अधर्म को धर्म और विपरीत को सही मान लेना (18.32), यज्ञशिष्ट अन्न खाने वाले सज्जनों का पाप-मुक्त होना और केवल स्वार्थ के लिए पकाने वालों का पाप ग्रहण करना (3.13), मान-अपमान और मित्र-वैर में सम रहकर कर्तृत्व-भाव छोड़ने वाला गुणातीत पुरुष (14.25), तथा श्रेष्ठ कर्म का सात्त्विक फल, राजस का दुःख और तामस का अज्ञान (14.16)। यह episode Jagat Ka Saar को discernment, sacrifice, equanimity, and quality of a...