Day 139 | 5 Shlok Per Day | राजस सुख, तामसी बुद्धि, यज्ञशेष अन्न, गुणातीत स्थिति और कर्मफल



आज के 5 श्लोक बताते हैं कि विषय-संयोग का सुख पहले अमृत जैसा लगकर अंत में विष बन जाता है, तमोगुण बुद्धि को अधर्म को भी धर्म मानने तक भ्रमित कर देता है, यज्ञशेष अन्न खाने वाले पापों से मुक्त होते हैं, मान-अपमान में सम रहने वाला गुणातीत कहलाता है, और कर्मों के फल सात्त्विक, राजस तथा तामस रूप में अलग-अलग होते हैं। 18.38 और 18.32 भोग-बुद्धि की सीमाएँ दिखाते हैं, जबकि 3.13, 14.25 और 14.16 कर्म, समत्व और फल-नियम को स्पष्ट करते हैं.

Description

Day 139 में हर हर गीता, हर घर गीता mission के साथ सुनिए: विषय और इन्द्रियों के संयोग से मिलने वाले राजस सुख का अंततः विष बनना (18.38), तमोगुण से ढकी बुद्धि का अधर्म को धर्म और विपरीत को सही मान लेना (18.32), यज्ञशिष्ट अन्न खाने वाले सज्जनों का पाप-मुक्त होना और केवल स्वार्थ के लिए पकाने वालों का पाप ग्रहण करना (3.13), मान-अपमान और मित्र-वैर में सम रहकर कर्तृत्व-भाव छोड़ने वाला गुणातीत पुरुष (14.25), तथा श्रेष्ठ कर्म का सात्त्विक फल, राजस का दुःख और तामस का अज्ञान (14.16)। यह episode Jagat Ka Saar को discernment, sacrifice, equanimity, and quality of action के साथ जोड़ता है.

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