Day 55: यज्ञ, अधियज्ञ, नरक-द्वार और अनन्य भक्ति | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
यज्ञभाव से मिले भोग, लौटाए बिना अकेले भोगना = चोरी (3.12)
“अधियज्ञ कौन? शरीर में कैसे? और अन्त समय में कैसे जाना जाए?”—अर्जुन का गहरा प्रश्न (8.2)
विश्व रूप के बाद पुनः चार भुजा और सौम्य मूर्ति दिखाकर अर्जुन को धीरज देना (11.50)
क्रोध, लोभ, काम – तीन नरक–द्वारों से मुक्त होकर ही परा गति (16.22, भाव)
“यदि सुदुराचार भी हो, पर अनन्य भाव से भजता हो, तो साधु मानो” (9.30)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (3.12/8.2/11.50/16.22/9.30)"
और "आज मैं किस जगह ‘यज्ञभाव + नरक-द्वार से सावधानी + अनन्य भक्ति की हिम्मत’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
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