Day 57: अनन्य भक्ति, ज्ञान–विज्ञान और मत्संस्थ शान्ति | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
सैकड़ों–हजारों दिव्य रूप—अर्जुन को भगवान का अद्भुत विराट-प्रसार दिखता है (11.5)
अनन्य भक्ति से ही मुझे तत्त्वतः जाना/देखा/प्राप्त किया जा सकता है (11.54)
यह परम गोपनीय ज्ञान–विज्ञान—जिससे अशुभ संसार से मुक्ति मिलती है (9.1)
नियतमनस योगी—मुझमें आत्मा को लगाकर मत्संस्थ निर्वाणपरमा शान्ति पाता है (6.15)
श्रवणपरायण मन्दबुद्धि भी संसार-सागर तर जाते हैं (13.25)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (11.5/11.54/9.1/6.15/13.25)"
और "आज मैं किस जगह ‘अनन्य भक्ति + ज्ञान–विज्ञान + मत्संस्थ शान्ति’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
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