Day 54: विविक्तसेवी साधक, धारणशक्ति और सहयज्ञ | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
विविक्तसेवी, लघ्वाशी, यतवाक्कायमानसः—जो नित्य ध्यानयोग में स्थित, वैराग्य का आश्रित साधक है (18.52)
“मैं वज्र, कामधेनु, कामदेव और वासुकि हूँ”—भगवान की विभूतियाँ (10.28)
बुद्धि और धृति का भी तीन-गुणी भेद—अब उसे विस्तार से सुनो (18.29)
फलाकांक्षा से धर्म–अर्थ–काम को पकड़े रहना—ऐसी धारणशक्ति राजसी है (18.34)
सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा…—यज्ञसहित प्रजा की सृष्टि; “यज्ञ ही इष्टकामधुक्” (3.10)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (18.52/10.28/18.29/18.34/3.10)"
और "आज मैं किस जगह ‘विविक्तसेवी जीवन + शुद्ध धारणशक्ति + सहयज्ञ भाव’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
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