Posts

Showing posts from April, 2026

Day 61: अनन्य भक्ति, महाकाल और सर्वव्यापी परमात्मा | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series

Image
  आज के 5 श्लोक: मुझमें अनन्ययोगेन अव्यभिचारिणी भक्ति —विविक्तदेशसेवी, जनसंसद् में अरति (13.10) मैं ही महाकाल हूँ —लोकक्षयकृत, युद्ध न करो तो भी सबका नाश हो जाएगा (11.32) स्वर्ग भोगकर पुनः मृत्युलोक —कामकाम सकामकर्मी बार-बार गतागत पाते हैं (9.21) सर्वतः पाणिपादं, सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम् —संसार को व्याप्त करके स्थित (13.13) तामसी धृति —स्वप्न, भय, शोक, विषाद, मद को धारण करती रहती है (18.35) CTA: कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (13.10/11.32/9.21/13.13/18.35)" और "आज मैं किस जगह ‘अनन्य भक्ति + महाकाल-बोध + तामसी धृति से सावधानी’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"