Day 61: अनन्य भक्ति, महाकाल और सर्वव्यापी परमात्मा | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
मुझमें अनन्ययोगेन अव्यभिचारिणी भक्ति—विविक्तदेशसेवी, जनसंसद् में अरति (13.10)
मैं ही महाकाल हूँ—लोकक्षयकृत, युद्ध न करो तो भी सबका नाश हो जाएगा (11.32)
स्वर्ग भोगकर पुनः मृत्युलोक—कामकाम सकामकर्मी बार-बार गतागत पाते हैं (9.21)
सर्वतः पाणिपादं, सर्वतोऽक्षिशिरोमुखम्—संसार को व्याप्त करके स्थित (13.13)
तामसी धृति—स्वप्न, भय, शोक, विषाद, मद को धारण करती रहती है (18.35)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (13.10/11.32/9.21/13.13/18.35)"
और "आज मैं किस जगह ‘अनन्य भक्ति + महाकाल-बोध + तामसी धृति से सावधानी’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
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