Day 65: ज्ञानयज्ञ, देहान्तरण और भक्ति की पूर्णता | हर हर गीता, हर घर गीता!
आज के 5 श्लोक:
द्रव्यमय यज्ञ से ज्ञानयज्ञ श्रेष्ठ—क्योंकि सारी कर्म-धारा ज्ञान में समाप्त होती है (4.33)
देहान्तरण का धीर बोध—जैसे शरीर में कौमार्य, यौवन, जरा बदलते हैं, वैसे ही आत्मा नया शरीर लेती है (2.13)
पुरुष और गुणों सहित प्रकृति को तत्त्वतः जानने वाला फिर नहीं जन्मता (13.23)
सम्पूर्ण कर्म भगवान में अर्पित कर, अनन्य भक्तियोग से भजना (12.6)
अधर्म से कुलस्त्रियाँ दूषित होती हैं, वर्णसङ्कर उत्पन्न होता है (1.41)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (4.33/2.13/13.23/12.6/1.41)"
और "आज मैं किस जगह ‘ज्ञानयज्ञ + देहान्तरण का बोध + कर्म-समर्पण’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"
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