आज के 5 श्लोक:
“हमें पता ही नहीं क्या बेहतर है”—अर्जुन का गहरा inner confusion (2.6)
वीतराग–भय–क्रोध, मन्मय, मामुपाश्रित—ज्ञान-तप से शुद्ध होकर मद्भाव को प्राप्त भक्त (4.10)
कोई क्षण भी अकर्म नहीं—सब प्रकृतिज गुणों से कर्म करने को बाध्य हैं (3.5)
सर्वेन्द्रियगुणाभासं… निर्गुणं गुणभोक्तृ च—ईश्वर का अद्भुत विरोधाभासी वर्णन (13.14)
इच्छा–द्वेषजन्य द्वन्द्व–मोह—इसी से सब प्राणी भारी अज्ञान में पड़ते हैं (7.27)
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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (2.6/4.10/3.5/13.14/7.27)"
और "आज मैं किस जगह ‘confusion में भी शरण + हर कर्म में सजगता + इच्छा–द्वेष पर नज़र’ रखूँगा/रखूँगी?"
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