Day 31: प्रकृति का खेल और विश्वरूप की लीला | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
कर्तापन का भ्रम—कर्म तो गुणों से प्रकृति करती है, अहंकारी “मैं कर्ता हूँ” मानता है (3.27)
अजोऽपि अव्ययात्मा—प्रकृति को अधीन कर अपनी योगमाया से प्रकट होता हूँ (4.6)
तीनों गुणों से मोहित जगत—इसलिए मुझ अव्यय, गुणातीत को नहीं जानता (7.13)
विश्व रूप दर्शन का निमन्त्रण—“मेरे देह में एकस्थ चराचर जगत देख” (11.7)
अर्जुन का विस्मय और प्रणाम—हृष्टरोमा होकर विश्वरूप को दण्डवत करके बोलना (11.14)
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कमेंट में लिखिए—“आज का मेरा श्लोक = (3.27/4.6/7.13/11.7/11.14)”
और “आज मैं किस काम में ‘मैं नहीं, प्रकृति कर रही है / भगवान करा रहे हैं’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?”
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