Day 32: क्षेत्र, श्रद्धा और घोर तप | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ परिचय—क्षेत्र क्या है, कैसा है, उसके विकार और कारण क्या हैं, क्षेत्रज्ञ कौन है (13.3)
विशुद्ध बुद्धि + धृति—इन्द्रियनियम, विषय-त्याग, राग-द्वेष का निष्कासन (18.51 संदर्भ के साथ 18.51–53 सेट‑अप)
जो जिस देव‑तनु को पूजना चाहे—उसी देवता में उसकी अचल श्रद्धा मैं ही स्थिर करता हूँ (9.21 संदर्भ 7.21)
त्रिविधा श्रद्धा—सात्त्विकी, राजसी, तामसी, स्वभावजा (17.2)
अशास्त्रविहित घोर तप—दम्भ, अहंकार, काम‑राग‑बल से प्रेरित कठोर तप (17.5)
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कमेंट में लिखिए—“आज का मेरा श्लोक = (13.3/18.51/9.21/17.2/17.5)”
और “आज मैं किस जगह अपनी श्रद्धा को ‘सात्त्विक’ दिशा में मोड़ने का अभ्यास करूँगा/करूँगी?”
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