Day 34: आसुर पतन से ब्रह्मदृष्टि तक | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series
आज के 5 श्लोक:
अनेकचित्तविभ्रान्त आसुरी वृत्ति—मोहजाल में फँसे, कामभोग में प्रसक्त होकर अशुचि नरक में गिरते हैं (16.16)
ब्रह्मदृष्टि वाला यज्ञ—अर्पण, हवि, अग्नि, कर्ता, फल—सब ब्रह्म ही है (4.24)
“सर्वगुह्यतमं” परम वचन—“तू मेरा अतिशय प्रिय है, इसलिए मैं तेरा परम हित कहूँगा” (18.64)
अफलाकाङ्क्षी सात्त्विक तप—परम श्रद्धा से, फल न चाहकर किया गया तीन प्रकार का तप (17.17)
नियत, संग-रहित, अरागद्वेष कर्म—फल न चाहकर किया गया कर्म सात्त्विक कहलाता है (18.23)
🌐 Ramshalaka : https://www.jagatpushpa.co.in/ramshalaka
🌐 Mood-based Geeta Shlok : https://www.jagatpushpa.co.in/Moodbasedshlok
CTA:
कमेंट में लिखिए—“आज का मेरा श्लोक = (16.16/4.24/18.64/17.17/18.23)”
और “आज मैं किस काम/तप को ‘अफलाकाङ्क्षी सात्त्विक’ भावना से करूँगा/करूँगी?”
#HarHarGeeta #HarGharGeeta #Daily5Shlok #BhagavadGita #SattvikKarm #BrahmaDrishti #Day34
Comments
Post a Comment