Day 72: अन्तर्यामी ईश्वर, अव्यक्त प्रकृति और पुरुषोत्तम-बोध | हर हर गीता, हर घर गीता!
आज के Day 72 में 5 अत्यंत गूढ़ श्लोक हैं—अन्तर्यामी ईश्वर जो सब प्राणियों के हृदय में स्थित है, सत्त्व-रजस-तमस से उत्पन्न भावों की वास्तविक प्रकृति, अव्यक्त-अवस्था की दृष्टि से शोक-रहित विवेक, पुरुषोत्तम का आत्म-ज्ञान, और क्लैब्य त्यागकर उठ खड़े होने की अर्जुन को दी गई प्रेरणा। 18.61 बताता है कि ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में स्थित होकर उन्हें उनकी माया के अनुसार यन्त्रारूढ़ जीवों की तरह भ्रमण कराता है।
यह episode उन साधकों के लिए है जो control, surrender और inner responsibility को गहराई से समझना चाहते हैं। 7.12 में भगवान स्पष्ट करते हैं कि सात्त्विक, राजस और तामस भाव मुझसे ही उत्पन्न प्रतीत होते हैं, हालांकि वास्तव में भगवान उनमें नहीं और वे भगवान में नहीं हैं। 2.28 जीवन और मृत्यु को अव्यक्त-व्यक्त-अव्यक्त की दृष्टि से देखने को कहता है; 10.15 में अर्जुन स्वीकार करता है कि भगवान को वे स्वयं ही अपने से जानते हैं; और 2.3 में भगवान अर्जुन को हृदय की दुर्बलता छोड़कर उठने को कहते हैं।
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"मेरा श्लोक = 18.61 / 7.12 / 2.28 / 10.15 / 2.3"
"आज मैंने किस जगह surrender, विवेक या courage का अभ्यास किया?"
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