Day 127 | 5 Shlok Per Day | विराट अग्नि, क्षणिक भोग, गुणों का प्रभाव और काम-विजय
आज के 5 श्लोक दिखाते हैं कि विराट रूप का उग्र तेज समस्त लोकों को व्याप्त कर रहा है, इन्द्रिय-भोग अनित्य होकर दुख के ही कारण हैं, सत्त्व-रज-तम क्रमशः सुख, कर्म और प्रमाद में बाँधते हैं, बुद्धि से परे आत्मज्ञान कामरूप शत्रु को जीतने का उपाय देता है, और जीव इन्द्रियों तथा मन के सहारे विषयों का सेवन करता है। 11.30 और 3.43 एक ओर ब्रह्मांडीय शक्ति और दूसरी ओर आंतरिक संघर्ष को सामने रखते हैं।
Description
Day 127 में हर हर गीता, हर घर गीता mission के साथ सुनिए: श्रीविष्णु के विराट रूप का उग्र तेज जो समस्त जगत को तपाता है (11.30), इन्द्रिय-संपर्क से उत्पन्न भोगों का दुःखयोनि और अनित्य होना (5.22), सत्त्व का सुख, रज का कर्म और तम का प्रमाद में लगाना (14.9), बुद्धि से परे आत्मतत्त्व को जानकर कामरूप दुर्जय शत्रु का वध (3.43), और श्रोत्र, चक्षु, स्पर्शन, रसना, घ्राण व मन के सहारे जीव का विषयों में प्रवृत्त होना (15.9)। यह episode Jagat Ka Saar को cosmic power, restraint, discernment, and victory over desire के साथ जोड़ता है.
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