ईश्वर और योगमाया – श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 25

 


ईश्वर और योगमाया – श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 25

ईश्वर क्यों सभी को प्रत्यक्ष नहीं होते?

श्लोक:
नाहं प्रकाशः सर्वस्य योगमायासमावृतः |
मूढोऽयं नाभिजानाति लोको मामजमव्ययम् ||

अनुवाद:
"मैं (ईश्वर) सबके लिए प्रत्यक्ष नहीं होता, क्योंकि मैं अपनी योगमाया से ढका रहता हूँ। यह मूढ़ (अज्ञानी) लोग मुझे जन्म-मरण वाला मानते हैं और मेरे अविनाशी स्वरूप को नहीं जानते।"


इस श्लोक का अर्थ और महत्व

श्रीकृष्ण यहाँ समझा रहे हैं कि वे अपनी योगमाया (दिव्य शक्ति) से स्वयं को साधारण लोगों की दृष्टि से छुपा लेते हैं। इसके कारण अज्ञानी लोग उन्हें केवल एक सामान्य व्यक्ति समझते हैं और उनके वास्तविक, अविनाशी (अव्यय) स्वरूप को नहीं पहचान पाते।

1. ईश्वर प्रत्यक्ष क्यों नहीं होते?
ईश्वर स्वयं को हर किसी के सामने प्रकट नहीं करते। उनकी माया (अलौकिक शक्ति) मनुष्यों को भ्रम में डाल देती है, जिससे वे उन्हें केवल एक साधारण व्यक्ति या कोई ऐतिहासिक चरित्र मानते हैं।

2. योगमाया का प्रभाव:
योगमाया वह शक्ति है जो ईश्वर की वास्तविकता को छुपाती है। जब तक कोई व्यक्ति भक्ति और ज्ञान के माध्यम से स्वयं को शुद्ध नहीं करता, तब तक वह ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को नहीं देख सकता।

3. मूढ़ लोग ईश्वर को क्यों नहीं पहचानते?
जो लोग सांसारिक मोह में उलझे रहते हैं और केवल बाहरी रूप को देखते हैं, वे ईश्वर को भी एक सामान्य व्यक्ति की तरह मानते हैं। वे यह नहीं समझ पाते कि भगवान अजन्मा (अज) और अविनाशी (अव्यय) हैं।


क्या यह शिक्षा आज भी प्रासंगिक है?

आज के समय में भी कई लोग ईश्वर को केवल एक धार्मिक कथा या ऐतिहासिक चरित्र के रूप में देखते हैं। लेकिन जो भक्त श्रद्धा और भक्ति के साथ भगवान को पहचानते हैं, वे उनकी दिव्यता को समझ पाते हैं। इस श्लोक से हमें यह सीख मिलती है कि केवल ज्ञान और भक्ति से ही हम ईश्वर के वास्तविक स्वरूप को समझ सकते हैं।

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