ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7 श्लोक 30 - भगवान को पहचानने की शक्ति

 


अपने समग्र स्वरूप को जानने की महिमा – श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 7, श्लोक 30

श्लोक:

साधिभूताधिदैवं मां साधियज्ञं च ये विदुः।
प्रयाणकालेऽपि च मां ते विदुर्युक्तचेतसः॥

अनुवाद:

"जो पुरुष अधिभूत, अधिदैव और अधियज्ञ के साथ मुझे जानते हैं, वे अंतकाल में भी मुझे जानते हैं और मुझको प्राप्त कर लेते हैं।"


इस श्लोक का अर्थ और महत्व

1. आत्मा, सृष्टि और परमात्मा का ज्ञान

  • श्रीकृष्ण यहाँ समझा रहे हैं कि जो व्यक्ति अधिभूत (भौतिक संसार), अधिदैव (देवताओं की शक्तियाँ), और अधियज्ञ (यज्ञ में स्थित भगवान) को जानता है, वह वास्तव में भगवान को ही जानता है।
  • भौतिक जगत (अधिभूत), देव शक्तियाँ (अधिदैव), और यज्ञ (अधियज्ञ) – ये तीनों भगवान का ही विस्तार हैं।

2. अंतिम समय में भगवान को याद रखने का महत्व

  • मृत्यु के समय वही स्मरण आता है, जो जीवन भर साधना की गई होती है।
  • जो व्यक्ति सच्चे मन से श्रीकृष्ण को जानता है, वह अंतकाल में भी उन्हें ही स्मरण करता है और मोक्ष प्राप्त करता है।

3. 'युक्तचेतस' – संयमित मन वाले व्यक्ति

  • जो निरंतर भक्ति में लीन रहते हैं और अपने मन को श्रीकृष्ण में स्थिर रखते हैं, वे अंतकाल में भी भगवान को ही प्राप्त करते हैं।
  • इस श्लोक का मुख्य संदेश है कि यदि हम जीवनभर भगवान का ध्यान करें, तो अंत समय में भी हमें उनकी ही प्राप्ति होगी।

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