Day 52: स्वधर्म, संसार-वृक्ष और तामस त्याग | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series



आज के 5 श्लोक:

  1. स्वधर्म गुणरहित हो तो भी श्रेष्ठ—परधर्म अच्छा निभाया जाए, फिर भी भयावह (3.35)

  2. अश्वत्थ संसार-वृक्ष—जिसका न आदि स्पष्ट, न अन्त, न स्थिर स्थिति; उसे असङ्ग–शस्त्र से काटना है (15.3)

  3. “मेरे अधीक्षकत्व में प्रकृति”—चराचर जगत की रचना करती है, यही कारण है कि जगत घूमता है (9.10)

  4. तामस कर्म—फल, हानि, हिंसा और अपनी क्षमता विचारे बिना, मोह से आरम्भ किया गया कर्म (18.25)

  5. नियत कर्म का मोहजन्य त्याग = तामस त्याग—उचित नहीं, इसलिए ऐसा त्याग तामस कहा गया (18.7)

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कमेंट में लिखिए—"आज का मेरा श्लोक = (3.35/15.3/9.10/18.25/18.7)"
और "आज मैं किस जगह ‘स्वधर्म पर टिकाव + असंग–शस्त्र से काटना + तामस त्याग से बचना’ का अभ्यास करूँगा/करूँगी?"

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