Day 66: वाणी का तप, आत्म-उद्धार और सूर्य-तेज | हर हर गीता, हर घर गीता! Daily 5 Shlok Series



आज के Day 66 में 5 गहरे श्लोक हैं—वाणी का तप जो सत्य, प्रिय और हितकर हो; कल्याणकृत का कभी विनाश नहीं; सूर्य, चन्द्र और अग्नि में स्थित भगवद्-तेज; आत्म-उद्धार का स्पष्ट आदेश; और श्रद्धायुक्त अनसूयु जो गीता-मत का सदा पालन करते हैं। 17.15 के अनुसार जो वाक्य उद्वेग न करनेवाला, प्रिय, हितकारक और यथार्थ हो, साथ ही स्वाध्याय और नाम-जप का अभ्यास हो, वही वाङ्मय तप है।

यह episode उन लोगों के लिए है जो अपने बोलने, सोचने और साधना करने के तरीके को शुद्ध करना चाहते हैं। 6.5 बताता है कि मनुष्य को अपने द्वारा अपना उद्धार करना चाहिए, क्योंकि मन ही अपना मित्र भी है और शत्रु भी; 15.12 कहता है कि सूर्य, चन्द्र और अग्नि का तेज भगवान का ही तेज है; और 3.31 बताता है कि श्रद्धा और अनसूया के साथ जो भगवान के मत का पालन करते हैं, वे कर्म-बन्धन से मुक्त हो जाते हैं।

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"मेरा श्लोक = 17.15 / 6.4 / 15.12 / 6.5 / 3.31"
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