Day 94 | 5 Shlok Per Day | आसुरी अहंकार, मोहिनी प्रकृति और अन्तर्यामी भगवान
आज के 5 श्लोक आसुरी सोच, मोहिनी प्रकृति, और भगवान के अन्तर्यामी स्वरूप का contrast दिखाते हैं। 16.14 में अहंकार बोलता है, 9.12 में विक्षिप्त चित्त आसुरी प्रकृति पकड़ते हैं, 17.6 में शरीर और अन्तःकरण दोनों को कृश करने वाला आसुर-निश्चय बताया गया है, 15.15 में भगवान हृदय में स्थित अन्तर्यामी हैं, और 3.7 में अनासक्त कर्मयोग का श्रेष्ठ मार्ग दिया गया है।
Description
Day 94 में हर हर गीता, हर घर गीता mission के साथ सुनिए: “मैंने शत्रु को मारा, मैं ही भोगी, सिद्ध, बलवान, सुखी हूँ” जैसे आसुरी अहंकार (16.14), व्यर्थ आशा-व्यर्थ कर्म-व्यर्थ ज्ञान का आसुरी मन (9.12), शरीरस्थ भूतग्राम और अन्तःशरीरस्थ भगवान को कृश करने वाला भाव (17.6), सबके हृदय में स्थित अन्तर्यामी (15.15), और मन से इन्द्रियों को वश में करके अनासक्त कर्मयोग (3.7)। यह episode Jagat Ka Saar को self-awareness, discipline और divine remembrance के साथ जोड़ता है।
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