Day 129 | 5 Shlok Per Day | पुष्पित वाणी से परे, अर्पण, भक्ति-योग, परमगति और प्रसाद



आज के 5 श्लोक बतलाते हैं कि केवल स्वर्ग-फल की प्रशंसा में डूबी भाषा से ऊपर उठना चाहिए, हर कर्म को भगवान को अर्पित करना चाहिए, आसुरी भाव वाले लोग भगवान को नहीं भजते, परमात्मा में तद्रूप होकर ज्ञान से पाप का क्षय होता है, और प्रसन्न अंतःकरण से समस्त दुःख दूर होकर बुद्धि स्थिर हो जाती है। 9.27 और 2.65 साधक को भक्ति और प्रसाद के व्यावहारिक मार्ग पर ले जाते हैं, जबकि 7.15 और 5.17 अन्तिम लक्ष्य की स्पष्टता देते हैं।

Description

Day 129 में हर हर गीता, हर घर गीता mission के साथ सुनिए: भोग और स्वर्ग-फल में ही रत “पुष्पित वाणी” से सावधान रहने की शिक्षा (2.42), जो कुछ भी किया जाए, खाया जाए, हवन, दान और तप—सबको भगवान को अर्पित करने का आदेश (9.27), मायाग्रस्त, ज्ञान-हरित, आसुरी भाव वाले मूढ़ों का भगवान से विमुख रहना (7.15), मन-बुद्धि का परमात्मा में तद्रूप होकर अपुनरावृत्ति यानी परमगति प्राप्त करना (5.17), और प्रसाद से दुःखों का नाश तथा बुद्धि का परमात्मा में स्थिर होना (2.65)। यह episode Jagat Ka Saar को surrender, clarity, purity, and liberation के साथ जोड़ता है.

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