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ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 3 - श्रीकृष्ण का अर्जुन पर विशेष अनुग्रह

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  "श्री हरि बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ""गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः । या स्वयं पद्म नाभस्य मुख पद्माद्विनिः सृता ।। अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजग शयनं पद्म नाभं सुरेशं विश्व आधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मी कान्तं कमल नयनं योगिभि: ध्यान गम्यम वन्दे विष्णुं भव भयहरं सर्व लोकैक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः साङ्ग पद क्रमोपनिषदै: गायन्ति यं सामगाः । ध्यान अवस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुर असुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥" क्या आपने कभी सोचा है कि क्यों श्रीकृष्ण ने अर्जुन को ही इस दिव्य ज्ञान का पुनः प्रकट किया? आज के श्लोक में हम जानेंगे कि श्रीकृष्ण अर्जुन को यह विशेष ज्ञान क्यों प्रदान कर रहे हैं। इस गहरे रहस्य को जानने के लिए बने रहिए! कल हमने श्लोक 2 में जाना कि यह दिव्य ज्ञान समय के साथ विलुप्त हो गया था, और यह पहले राजर्षियों द्वारा संरक्षित किया जात...

ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 2 - दिव्य ज्ञान की खोई हुई परंपरा

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  "श्री हरि बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ""गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः । या स्वयं पद्म नाभस्य मुख पद्माद्विनिः सृता ।। अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजग शयनं पद्म नाभं सुरेशं विश्व आधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मी कान्तं कमल नयनं योगिभि: ध्यान गम्यम वन्दे विष्णुं भव भयहरं सर्व लोकैक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः साङ्ग पद क्रमोपनिषदै: गायन्ति यं सामगाः । ध्यान अवस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुर असुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥" क्या आपने कभी सोचा है कि सदियों से चल रहा यह दिव्य ज्ञान समय के साथ कैसे खो गया? आज के श्लोक में श्रीकृष्ण हमें बताएंगे कि किसने इस ज्ञान को संरक्षित किया और कैसे यह ज्ञान समय के साथ विलुप्त हो गया। आइए इस रहस्य को जानें! कल हमने श्लोक 1 में जाना कि यह दिव्य ज्ञान सबसे पहले सूर्य-देवता विवस्वान को दिया गया था, फिर यह मनु और इक्ष्वाकु तक पह...

ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 4 श्लोक 1 - दिव्य ज्ञान की उत्पत्ति और गूढ़ रहस्य

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 "श्री हरि बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ""गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः । या स्वयं पद्म नाभस्य मुख पद्माद्विनिः सृता ।। अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजग शयनं पद्म नाभं सुरेशं विश्व आधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मी कान्तं कमल नयनं योगिभि: ध्यान गम्यम वन्दे विष्णुं भव भयहरं सर्व लोकैक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः साङ्ग पद क्रमोपनिषदै: गायन्ति यं सामगाः । ध्यान अवस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुर असुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥" क्या आप जानना चाहते हैं कि यह दिव्य ज्ञान सबसे पहले किसे प्रदान किया गया था और कैसे यह ज्ञान युगों-युगों तक चला आ रहा है? आज के श्लोक में श्रीकृष्ण हमें इस पवित्र ज्ञान की उत्पत्ति के बारे में बताएंगे। आइए इस यात्रा को शुरू करें! कल हमने अध्याय 3 के श्लोक 43 में जाना कि कैसे आत्म-नियंत्रण और बुद्धि से मन और इंद्रियों को वश में किया जा सकता ...

ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 43 - इच्छाओं पर विजय का मार्ग

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"श्री हरि बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ""गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः । या स्वयं पद्म नाभस्य मुख पद्माद्विनिः सृता ।। अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजग शयनं पद्म नाभं सुरेशं विश्व आधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मी कान्तं कमल नयनं योगिभि: ध्यान गम्यम वन्दे विष्णुं भव भयहरं सर्व लोकैक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः साङ्ग पद क्रमोपनिषदै: गायन्ति यं सामगाः । ध्यान अवस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुर असुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥" क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण के अनुसार, इच्छाओं पर विजय पाने का सबसे प्रभावी तरीका क्या है? आज के श्लोक में वे बताते हैं कि आत्मा के बल से हम मन और इंद्रियों के नियंत्रण से मुक्त हो सकते हैं। आइए इस गहरे रहस्य को समझें। कल हमने श्लोक 42 में जाना कि इंद्रियां, मन और बुद्धि के ऊपर आत्मा का वास है, और यह आत्मा ही हमें सही मार्ग दिखा सकती है। ...

ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 42 - इंद्रिय, मन और बुद्धि की शक्ति का रहस्य

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 "श्री हरि बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ""गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः । या स्वयं पद्म नाभस्य मुख पद्माद्विनिः सृता ।। अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजग शयनं पद्म नाभं सुरेशं विश्व आधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मी कान्तं कमल नयनं योगिभि: ध्यान गम्यम वन्दे विष्णुं भव भयहरं सर्व लोकैक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः साङ्ग पद क्रमोपनिषदै: गायन्ति यं सामगाः । ध्यान अवस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुर असुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥" क्या आप जानना चाहते हैं कि हमारी इंद्रियों, मन और बुद्धि के बीच कौन सबसे शक्तिशाली है? और कैसे आत्मा इन सब पर विजय पा सकती है? श्रीकृष्ण आज के श्लोक में इस गहरे सत्य का रहस्य उजागर करते हैं। आइए इसे समझें और अपने जीवन को सही दिशा में मोड़ें। कल के श्लोक 40 और 41 में हमने जाना कि काम और क्रोध हमारे मन, इंद्रियों और बुद्धि में निवास करते हैं ...

ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 40 से 41 - मन, बुद्धि और इंद्रियों में कामना का निवास

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"श्री हरि बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ""गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः । या स्वयं पद्म नाभस्य मुख पद्माद्विनिः सृता ।। अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजग शयनं पद्म नाभं सुरेशं विश्व आधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मी कान्तं कमल नयनं योगिभि: ध्यान गम्यम वन्दे विष्णुं भव भयहरं सर्व लोकैक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः साङ्ग पद क्रमोपनिषदै: गायन्ति यं सामगाः । ध्यान अवस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुर असुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥" क्या आप जानते हैं कि इच्छाएं और वासनाएं हमारे ज्ञान को पूरी तरह से ढक सकती हैं? श्रीकृष्ण आज के श्लोक में बताते हैं कि ये कैसे हमारे विवेक को कमजोर कर देती हैं और जीवन में प्रगति के रास्ते में बाधा बनती हैं। आइए गीता के इस श्लोक से मन के गहरे रहस्यों को समझें। कल के श्लोक 39 में हमने चर्चा की थी कि कामना हमारे ज्ञान को ढक देती है, जिससे हम भ...

ईश्वर अर्जुन संवाद श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 3 श्लोक 39 कामना कैसे ज्ञान...

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"श्री हरि बोलो ग्रंथराज श्रीमद्भगवद्गीता जी की जय || ॥ ॐ श्रीपरमात्मने नमः ॥ ""गीता सुगीता कर्तव्या किमन्यैः शास्त्र विस्तरैः । या स्वयं पद्म नाभस्य मुख पद्माद्विनिः सृता ।। अथ ध्यानम् शान्ताकारं भुजग शयनं पद्म नाभं सुरेशं विश्व आधारं गगन सदृशं मेघवर्णं शुभाङ्गम् । लक्ष्मी कान्तं कमल नयनं योगिभि: ध्यान गम्यम वन्दे विष्णुं भव भयहरं सर्व लोकैक नाथम् ॥ यं ब्रह्मा वरुणेन्द्र रुद्रमरुतः स्तुन्वन्ति दिव्यैः स्तवै- र्वेदैः साङ्ग पद क्रमोपनिषदै: गायन्ति यं सामगाः । ध्यान अवस्थित तद्गतेन मनसा पश्यन्ति यं योगिनो- यस्यान्तं न विदुः सुर असुरगणा देवाय तस्मै नमः ॥ वसुदेव सुतं देवं कंस चाणूर मर्दनम् । देवकी परमानन्दं कृष्णं वन्दे जगद्गुरुम् ॥" क्या आप जानते हैं कि इच्छाएं और वासनाएं हमारे ज्ञान को पूरी तरह से ढक सकती हैं? श्रीकृष्ण आज के श्लोक में बताते हैं कि ये कैसे हमारे विवेक को कमजोर कर देती हैं और जीवन में प्रगति के रास्ते में बाधा बनती हैं। आइए गीता के इस श्लोक से मन के गहरे रहस्यों को समझें। कल हमने श्लोक 38 की चर्चा की थी, जिसमें श्रीकृष्ण ने बताया था कि काम और क्रोध हमार...